भारत की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के मतलब को बढ़ाता है और इसमें बायोडायवर्सिटी, वन्यजीवों और इकोसिस्टम की सुरक्षा को साफ़ तौर पर शामिल करता है। यह फैसला तब आया है जब भारत दुनिया का पहला देश बना था जिसने कॉर्पोरेट CSR खर्च को कानूनी रूप से अनिवार्य किया था, इसके लगभग 13 साल बाद।
फैसले की मुख्य बातें:
* CSR अब सिर्फ़ सामाजिक कल्याण तक सीमित नहीं है
कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कॉर्पोरेट ज़िम्मेदारी को शेयरधारकों के हितों से आगे बढ़कर पर्यावरण और पारिस्थितिकी सुरक्षा को भी शामिल करना चाहिए।
* पर्यावरण = सामाजिक ज़िम्मेदारी का मूल
जजों ने कहा कि “कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी में स्वाभाविक रूप से पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी शामिल होनी चाहिए”।
* कंपनियों पर संवैधानिक कर्तव्य लागू
कंपनियों को अनुच्छेद 51A(g) के तहत लाया गया है, जो इन कर्तव्यों को अनिवार्य करता है:
– प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना
– जंगलों, नदियों, झीलों और वन्यजीवों की सुरक्षा करना
– सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया दिखाना
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* बायोडायवर्सिटी और वन्यजीव समान हितधारक हैं
कंपनियां प्रकृति और गैर-मानव जीवन रूपों के अधिकारों को नज़रअंदाज़ करते हुए खुद को सामाजिक रूप से ज़िम्मेदार नहीं कह सकतीं।
* कॉर्पोरेट जवाबदेही में बदलाव
CSR अब सिर्फ़ वित्तीय या प्रतिष्ठा से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसमें नैतिक, कानूनी और संवैधानिक दायित्व भी शामिल हैं।
* वैश्विक महत्व
यह फैसला सस्टेनेबिलिटी-केंद्रित कॉर्पोरेट गवर्नेंस में एक वैश्विक नेता के रूप में भारत की स्थिति को मज़बूत करता है।
यह फैसला CSR को एक धर्मार्थ दायित्व से बदलकर एक समग्र पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी में बदल देता है, यह इस बात पर ज़ोर देता है कि आर्थिक विकास प्रकृति की कीमत पर नहीं हो सकता। कंपनियां अब संवैधानिक रूप से पारिस्थितिक प्रबंधन से जुड़ी हुई हैं।


