IIT Kharagpur के एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि यद्यपि वनीकरण और कृषि वानिकी के माध्यम से भारत का हरित क्षेत्र बढ़ रहा है, फिर भी प्रकाश संश्लेषण क्षमता में कमी के कारण वनों का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। अध्ययन में पाया गया कि 2010-2019 के दौरान पिछले दशक की तुलना में दक्षता में 5% की गिरावट आई है, जिसका पूर्वी हिमालय, पश्चिमी घाट और सिंधु-गंगा के मैदान जैसे क्षेत्रों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की नमी में कमी, उच्च तापमान, जंगल की आग, भूस्खलन, वनों की कटाई और खनन जैसे कारक भारत के वन पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर कर रहे हैं।
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यह गिरावट जैव विविधता, लकड़ी उत्पादन और वनवासियों की आजीविका के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करती है, साथ ही कार्बन सिंक के रूप में कार्य करने की वनों की क्षमता को भी कम करती है। वैज्ञानिक आगाह करते हैं कि तत्काल उपायों के बिना—जैसे कि देशी वनों का संरक्षण, सतत प्रबंधन, वैज्ञानिक वनीकरण, उत्सर्जन में कमी और कार्बन कैप्चर तकनीकों को अपनाना—भारत के वनों को भविष्य में “वनीकरण” का सामना करना पड़ सकता है।


