Gaur पुनरुत्पादन योजना पर दूसरी वार्षिक सह तकनीकी रिपोर्ट (जून 2024-जून 2025) ने भारत के वन्यजीव संरक्षण समुदाय में आशा की लहर ला दी है। आधिकारिक तौर पर जारी की गई यह रिपोर्ट मध्य प्रदेश के Sanjay Tiger Reserve में गौर (बोस गौरस) — भारतीय बाइसन — की उल्लेखनीय सफलता की कहानी पर प्रकाश डालती है।
एक बार स्थानीय रूप से विलुप्त हो चुके गौर ने न केवल जंगल में अपना स्थान पुनः प्राप्त किया है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को भी नया रूप दे रहे हैं। उनके चरने के तरीके घास के मैदानों को पुनर्जीवित करने, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और बाघों तथा अन्य मांसाहारी जीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक शिकार-शिकारी श्रृंखला को सहारा देकर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद कर रहे हैं।
यह महत्वाकांक्षी पुनरुत्पादन पहल मध्य प्रदेश वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और विभिन्न संरक्षण भागीदारों का एक संयुक्त प्रयास है। यह पुनर्वनीकरण, प्रजातियों की पुनर्प्राप्ति और आवास पुनर्स्थापन के प्रति भारत की बढ़ती प्रतिबद्धता का उदाहरण है — यह सुनिश्चित करते हुए कि लुप्त प्रजातियों को उनके प्राकृतिक घर में पनपने का दूसरा मौका मिले।
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रिपोर्ट में बताया गया है कि वैज्ञानिक निगरानी, आवास संवर्धन और सामुदायिक भागीदारी ने गौर के सफल अनुकूलन में कैसे योगदान दिया है। स्थानीय समुदायों ने सह-अस्तित्व को बढ़ावा देकर और संघर्ष को कम करके महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे यह साबित होता है कि मनुष्य और वन्यजीव एक साथ समृद्ध हो सकते हैं।
गौर पुनर्स्थापन योजना आज संरक्षण-संचालित पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के लिए एक आदर्श के रूप में उभर रही है, जो एक स्थायी और जैव-विविध भविष्य के लिए भारत के दृष्टिकोण को प्रतिध्वनित करती है। संजय टाइगर रिजर्व में प्रत्येक गौर की वापसी के साथ, आशा, लचीलेपन और पारिस्थितिक नवीनीकरण का एक नया अध्याय शुरू होता है।


