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Supreme Court On Criteria For Identification Of Private Forests : गोवा में निजी वनों की पहचान के लिए मौजूदा मानदंड वैध रहेंगे

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Supreme Court On Criteria For Identification Of Private Forests : सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में निर्णय लिया कि मौजूदा मानक पर्याप्त और वैध हैं और गोवा राज्य में निजी “वनों” की पहचान के मानदंडों में बदलाव से संबंधित अपीलों में इन्हें बदलने की आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने घोषणा की कि “गोवा राज्य में निजी वनों की पहचान और सीमांकन से संबंधित मुद्दा तीन मानदंडों पर अंतिम रूप से पहुंच गया है जैसा कि यहां वन से संबंधित ऊपर बताया गया है। वृक्ष संरचना, सन्निहित वन भूमि और न्यूनतम क्षेत्रफल 5 (पांच) हेक्टेयर और छत्र घनत्व 0.4 से कम नहीं होना चाहिए।”

आगे कहा गया कि, “…यदि मानदंड यानी, 0.4 का चंदवा घनत्व और 5 हेक्टेयर का न्यूनतम क्षेत्र क्रमशः 0.1 और 1 हेक्टेयर तक कम कर दिया जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप नारियल, बगीचे, बांस के वृक्षारोपण होंगे किसानों द्वारा अपनी निजी भूमि पर उगाए गए ताड़, सुपारी, काजू आदि को निजी वन की श्रेणी में रखा गया है।

अपीलकर्ता फाउंडेशन के आवेदनों को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि “वन” की पहचान के लिए मानदंड निर्धारित करने की समस्या टी.एन. में कार्यवाही का हिस्सा थी। गोदावर्मन मामला, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने उठाया था। बेंच ने एनजीटी के विवादित आदेश को बरकरार रखा। विशेष रूप से, ट्रिब्यूनल ने गोवा के मुख्य सचिव को जंगल की पहचान और सीमांकन को पूरा करने के लिए एक समयसीमा विकसित करने का आदेश दिया था, भले ही मामलों का फैसला उनकी योग्यता के आधार पर नहीं किया गया था।

प्रारंभ में, विषय के इतिहास की समीक्षा में, अदालत ने कहा कि गोवा के वन विभाग ने 1991 में मानदंडों का एक सेट विकसित किया था। बाद में इन मानदंडों को सावंत समिति (1997) और करपुरकर समिति (2000) द्वारा अपनाया गया, जिनकी स्थापना की गई थी टी.एन. में एक अदालत के आदेश के जवाब में राज्य द्वारा। गोदावर्मन ने निजी वनों की पहचान की। इसके बाद, कुछ अतिरिक्त समितियाँ स्थापित की गईं और उन्होंने भी निजी वनों की पहचान करने के लिए समान मानकों का उपयोग किया।

अपीलकर्ता की अपील का मुख्य फोकस 1991 से चंदवा घनत्व मानदंड (मानदंड संख्या iii) था। इसका तर्क यह था कि, 1980 के वन संरक्षण अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, 0.1 और 0.4 के बीच वृक्ष चंदवा घनत्व वाले प्राकृतिक वनस्पति क्षेत्र “वनों” के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।

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अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अपमानित होने और 0.4 से कम चंदवा घनत्व होने के बावजूद, कई स्थान जो पहले घने या मध्यम घने जंगल थे, उन्हें अभी भी जंगलों के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, इसमें कहा गया है कि एफसीए, 1980 ने बिना अनुमति प्राप्त किए वानिकी के अलावा अन्य उपयोगों के लिए ऐसी भूमि के एकतरफा रूपांतरण पर रोक लगा दी है।

मूल शिकायत अनिवार्य रूप से यह थी कि राज्य द्वारा नियुक्त समितियाँ उन क्षेत्रों को पहचानने में विफल रहीं जो कभी जंगल थे लेकिन अब नष्ट हो गए हैं, और इन क्षेत्रों के बारे में जानकारी नहीं दी गई है। अपीलकर्ता ने अपने दावों को मजबूत करने के लिए भारतीय वन सर्वेक्षण के मापदंडों का हवाला दिया – जो 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 0.1 घनत्व वाले जंगल पर आधारित थे।

इसके विपरीत, उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि निजी वनों के पदनाम के लिए स्थापित 1991 मानदंड अंतिम हो गए थे। यह तर्क दिया गया था कि क्योंकि वन विभाग के लिए वन भूमि के छोटे हिस्से को समय के साथ संरक्षित करना टिकाऊ नहीं था, इसलिए विभाग ने 40% क्राउन घनत्व और न्यूनतम सीमा 5 (पांच) हेक्टेयर का अनुरोध किया था। 1997 में गोवा राज्य की एक सार्वजनिक अधिसूचना में वनों की पहचान के लिए आवश्यकताओं को समझाया गया था – अर्थात्, “चंदवा घनत्व 0.4 से कम नहीं होना चाहिए” – ने इस मामले पर ध्यान आकर्षित किया।

उत्तरदाताओं ने तर्क दिया कि चूंकि अपीलकर्ता ने पहले दो बार मानदंडों की पुन: जांच करने का प्रयास किया था, लेकिन असफल रहा था, अपील को पुनर्निर्णय द्वारा रोक दिया गया था। आगे यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने टाटा हाउसिंग डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बनाम गोवा फाउंडेशन के मामले में वनों की पहचान के लिए पहले से मौजूद मानकों को अपनी मंजूरी दे दी थी।

एफएसआई मापदंडों पर अपीलकर्ता की निर्भरता के खिलाफ उठाई गई आपत्ति का दावा था कि न्यूनतम मानचित्रण योग्य क्षेत्र के आधार पर सुविचारित वन का निर्धारण करने के लिए एफएसआई-स्थापित दिशानिर्देशों और उसी क्षेत्र की राज्यों की पहचान के बीच कोई संबंध नहीं था। यह स्पष्ट किया गया कि, टी.एन. के विपरीत। गोदावर्मन की वन भूमि और क्षेत्र की मात्रा की गणना, एफएसआई अपने मापदंडों का उपयोग करके भारत में वृक्ष आवरण और वन आवरण का मानचित्रण कर रही थी।

उत्तरदाताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि, यदि 0.1 घनत्व तर्क को स्वीकार किया जाना चाहिए, तो दस से बीस पेड़ों वाले प्रत्येक 10,000 वर्ग मीटर को जंगलों के रूप में वर्गीकृत करने की आवश्यकता होगी, और निजी भूमि के प्रत्येक टुकड़े को एक श्रमसाध्य पूर्व मंजूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा।

अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता ने बयानों को सुनने और सहायक दस्तावेजों की समीक्षा करने के बाद 1997 के नोटिस में बताए गए मानदंडों का विरोध नहीं किया था। फैसले के अनुसार, अपीलकर्ता को आवश्यकताओं के आधार पर इस समय एक समस्या लाने से रोक दिया गया था।

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यह भी नोट किया गया कि टाटा हाउसिंग इस निष्कर्ष पर पहुंची कि सावंत समिति की दूसरी रिपोर्ट में उल्लिखित तीन मानक उचित और उचित थे।

अदालत ने शुद्ध वर्तमान मूल्य की धारणा पर अपीलकर्ता की निर्भरता को खारिज कर दिया, जिसे अदालत ने टी.एन. में मान्य किया था। गोदावर्मन ने वनों की कटाई से होने वाले आर्थिक नुकसान का पता लगाया।

“विशेषज्ञों ने पहचान प्रक्रिया पूरी कर ली है, जो सावंत समिति की रिपोर्ट द्वारा समर्थित है और टाटा हाउसिंग (उपरोक्त) मामले में इस अदालत द्वारा अनुमोदित है। इसलिए, हम ऐसा करने से बचते हैं क्योंकि हमारे लिए बैठना उचित या स्वीकार्य नहीं होगा विशेषज्ञों की कुर्सी पर बैठें और उनकी राय के विरोध में हमारी या अपीलकर्ताओं की राय रखें।

महत्वपूर्ण रूप से, अदालत ने अपीलकर्ता की परस्पर विरोधी स्थिति पर विचार किया। एक ओर, यह उन मानकों का विरोध कर रहा था जो सावंत और करपुरकर समितियों ने अन्य बातों के अलावा, निजी लकड़ियों की पहचान के लिए तय किए थे। इसके विपरीत, यह ट्रिब्यूनल के सामने समान मानकों पर निर्भर था।

उत्तरदाताओं का तर्क है कि निर्दिष्ट वन की पहचान के लिए मौजूदा मानकों को बदलने से किए जा रहे संरक्षण प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

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अदालत ने आगे कहा कि उसने पहचान के लिए राष्ट्रीय मानकों की असंभवता को पहचानते हुए स्पष्ट रूप से विशेषज्ञ समितियों (राज्य सरकारों द्वारा गठित) को वन क्षेत्रों को नामित करने की जिम्मेदारी दी थी।

“…मानदंडों के अनुप्रयोग को पूरे देश में सार्वभौमिक रूप से मानकीकृत नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह प्रत्येक राज्य में प्रचलित विशिष्ट भूगोल और भौगोलिक स्थितियों पर निर्भर है। प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट भौगोलिक विशेषताएं होती हैं, और परिणामस्वरूप, मानदंड एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न हो सकते हैं।

अपीलों को खारिज करते हुए, अदालत ने 2015 में पारित अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उत्तरदाताओं को किसी भी भूखंड के रूपांतरण के लिए कोई ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ जारी नहीं करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें 0.1 से अधिक वृक्ष चंदवा घनत्व और 1 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र के साथ प्राकृतिक वनस्पति थी। .

Roshan Khamari
Roshan Khamarihttp://jungletak.in
Biographical Information - Roshan Khamari Name: Roshan Khamari Date of Birth: February 12, 2002 Place of Birth: Kalahandi District, Odisha, India Roshan Khamari is a dynamic and visionary individual with a passion for nature, wildlife, and journalism. Born on February 12, 2002, in the scenic landscapes of Kalahandi district in Odisha, India, Roshan's upbringing in the midst of lush forests and vibrant wildlife fostered a deep connection with the natural world from a young age. Driven by his love for nature and wildlife conservation, Roshan embarked on a dual educational journey, pursuing both a BA in Journalism and Mass Communication and a BSc in Forestry, Wildlife, and Environmental Science simultaneously. This unique combination reflects his commitment to raising awareness about environmental issues and using journalism as a powerful tool to amplify nature's voice. As a young and enthusiastic advocate for the environment, Roshan's passion led him to found Jungle Tak, India's first forest-based news platform. Through Jungle Tak, Roshan endeavors to bring people closer to the wonders of the wild, inspiring a deeper appreciation for nature's beauty and fostering a sense of responsibility towards conservation. With an academic background in journalism and forestry, wildlife, and environmental science, Roshan strives to use his knowledge and platform to educate, engage, and empower others in the realm of nature and wildlife conservation. As he continues on his journey to make a positive impact on the environment, Roshan's dedication, vision, and unwavering commitment to preserving the beauty of our planet's wilderness serve as an inspiration to all. Biographical Information updated as of August2023

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